घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग: शिव की करुणा, अटूट भक्ति और 12वें ज्योतिर्लिंग की दिव्य गाथा

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग – Shri Ghrishneshwar Jyotirlinga

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परिचय: जहाँ आस्था इतिहास से मिलती है

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) जिले के शांत वेरुल (वेरुळ) गाँव में, जहाँ इतिहास की गूँज पत्थरों में सुनाई देती है, एक ऐसा दिव्य स्थल है जो आध्यात्मिकता का जीवंत केंद्र है। एक ओर जहाँ यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, एलोरा की गुफाएँ, प्राचीन भारत की कलात्मक भव्यता का एक मौन संग्रहालय हैं, वहीं दूसरी ओर, उनसे कुछ ही कदमों की दूरी पर स्थित श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, अटूट आस्था और जीवंत परंपराओं का स्पंदित हृदय है । यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम, यानी द्वादश ज्योतिर्लिंग है, और इसे केवल एक मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि एक पवित्र तीर्थयात्रा के समापन बिंदु के रूप में देखा जाता है ।  

घृष्णेश्वर का शाब्दिक अर्थ है “करुणा के ईश्वर” । यह नाम स्वयं उस पौराणिक कथा का सार है जो इस मंदिर की नींव में है – एक ऐसी कथा जो अटूट भक्ति, असहनीय दुःख, अविश्वसनीय क्षमा और अंत में, दिव्य करुणा पर आधारित है। यह ब्लॉग आपको घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की गहराईयों में ले जाएगा, जहाँ हम इसके लचीले इतिहास, इसकी अद्वितीय वास्तुकला, इसकी मार्मिक पौराणिक कथाओं और एक सफल तीर्थयात्रा के लिए आवश्यक सभी व्यावहारिक जानकारियों का अन्वेषण करेंगे।  

इतिहास की परतें: विनाश से पुनर्निर्माण तक का सफर

घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास इसकी पौराणिक कथा के समान ही लचीलेपन और पुनरुत्थान की कहानी कहता है। यह मंदिर समय के थपेड़ों, आक्रमणों के घावों और आस्थावान शासकों द्वारा किए गए जीर्णोद्धार का साक्षी रहा है।

प्राचीन उत्पत्ति

मंदिर की जड़ें 6वीं से 8वीं शताब्दी के बीच राष्ट्रकूट वंश के शासनकाल तक जाती हैं, जिन्होंने निकटवर्ती एलोरा की गुफाओं का भी निर्माण करवाया था । यह इस बात का प्रमाण है कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही शैव धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।  

संघर्ष का काल

13वीं और 14वीं शताब्दी के दौरान, दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों ने इस पवित्र स्थल को भी निशाना बनाया और इसे भारी क्षति पहुँचाई । इस काल में मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया, और यह उस युग के कई अन्य हिंदू मंदिरों की तरह ही विनाश का शिकार हुआ।  

मराठा पुनरुत्थान और वर्तमान स्वरूप

मंदिर के पुनरुत्थान का श्रेय मराठा शासकों को जाता है। 16वीं शताब्दी में, छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा, मालोजी भोसले ने इसका पहला महत्वपूर्ण जीर्णोद्धार करवाया, जिससे इस स्थल की पवित्रता को पुनः स्थापित किया गया ।  

हालांकि, मंदिर का वर्तमान भव्य स्वरूप 18वीं शताब्दी में इंदौर की महान रानी, देवी अहिल्याबाई होल्कर की देन है । उन्होंने अपने अखिल भारतीय मंदिर जीर्णोद्धार अभियान के तहत इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। एक रोचक वृत्तांत के अनुसार, उस समय यह क्षेत्र निजाम के अधीन था, जिन्होंने पुनर्निर्माण की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। तब रानी अहिल्याबाई ने कूटनीति का प्रयोग करते हुए रक्षाबंधन के अवसर पर निजाम को राखी भेजी और भेंट के रूप में घृष्णेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार की अनुमति मांग ली, जिसे निजाम मना नहीं कर सके ।  

यह विनाश और पुनर्निर्माण का चक्र मात्र एक ऐतिहासिक घटनाक्रम नहीं है, बल्कि यह मंदिर की मूल पौराणिक कथा का एक भौतिक प्रतिबिंब है। जिस प्रकार घुष्मा के पुत्र की मृत्यु हुई और फिर अटूट आस्था से उसका पुनर्जीवन हुआ, उसी प्रकार इस मंदिर को भी विध्वंस का सामना करना पड़ा और फिर आस्थावान शासकों के हाथों इसका पुनरुत्थान हुआ। यह मंदिर स्वयं ‘आस्था के माध्यम से लचीलेपन’ का एक जीवंत प्रतीक है।

ऐतिहासिक समयरेखा

कालखंडघटना
6वीं-8वीं शताब्दीराष्ट्रकूट वंश द्वारा मूल निर्माण का अनुमान
13वीं-14वीं शताब्दीदिल्ली सल्तनत द्वारा मंदिर का विनाश
16वीं शताब्दीमालोजी भोसले द्वारा पहला जीर्णोद्धार
18वीं शताब्दीरानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा वर्तमान मंदिर का निर्माण

पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व: घुष्मा की भक्ति की अमर कहानी

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कथा शिव पुराण में वर्णित है और यह मानवीय भावनाओं—प्रेम, ईर्ष्या, दुःख, क्षमा और भक्ति—की एक गहन कहानी है ।  

घुष्मेश्वर की कथा

प्राचीन काल में, देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नामक एक धर्मपरायण ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे । वे निःसंतान थे, जिसके कारण सुदेहा बहुत दुखी रहती थी। समाज के तानों से व्यथित होकर और वंश को आगे बढ़ाने की इच्छा से, सुदेहा ने अपने पति का विवाह अपनी छोटी बहन घुष्मा (जिन्हें घृष्णा या कुसुमा भी कहा गया है) से करवा दिया ।  

घुष्मा भगवान शिव की परम भक्त थीं। वह प्रतिदिन 101 पार्थिव (मिट्टी के) शिवलिंग बनातीं, उनकी विधि-विधान से पूजा करतीं और फिर उन्हें पास के एक सरोवर में विसर्जित कर देती थीं । उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव की कृपा से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। प्रारंभ में तो दोनों बहनें बहुत प्रसन्न थीं, लेकिन समय के साथ सुदेहा के मन में अपनी बहन और उसके पुत्र के प्रति ईर्ष्या ने जन्म ले लिया ।  

एक रात, ईर्ष्या की आग में जल रही सुदेहा ने एक भयावह कदम उठाया। उसने सोते हुए घुष्मा के पुत्र की हत्या कर दी और उसके शव को उसी सरोवर में फेंक दिया जहाँ घुष्मा शिवलिंग विसर्जित करती थीं । अगली सुबह, घर में कोहराम मच गया, लेकिन इस असहनीय दुःख की घड़ी में भी घुष्मा अपनी शिव भक्ति से विचलित नहीं हुईं। उन्होंने अपनी दैनिक पूजा को उसी निष्ठा के साथ जारी रखा, मानो कुछ हुआ ही न हो ।  

करुणा के ईश्वर का प्राकट्य

जब घुष्मा अपनी पूजा समाप्त कर शिवलिंगों को विसर्जित करने सरोवर के पास गईं, तो एक चमत्कार हुआ। उनका पुत्र सरोवर से जीवित बाहर निकल आया । उसी क्षण, भगवान शिव स्वयं वहां प्रकट हुए। वे घुष्मा की अडिग भक्ति से अत्यंत प्रसन्न थे, लेकिन सुदेहा के क्रूर कृत्य से क्रोधित थे। उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया और सुदेहा को दंड देने की पेशकश की ।  

लेकिन घुष्मा ने, जिनकी भक्ति जितनी गहरी थी, उतनी ही बड़ी उनकी करुणा थी, हाथ जोड़कर भगवान शिव से अपनी बहन को क्षमा करने की प्रार्थना की । इसके साथ ही, उन्होंने लोक-कल्याण के लिए भगवान शिव से उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए निवास करने का वरदान मांगा । भगवान शिव ने घुष्मा की दोनों प्रार्थनाएं स्वीकार कर लीं और वहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए। घुष्मा की भक्ति के कारण ही वे ‘घुश्मेश्वर’ या ‘घृष्णेश्वर’ कहलाए ।  

आध्यात्मिक महत्व

  • द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा की पूर्णता: यह दृढ़ मान्यता है कि घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बिना बारह ज्योतिर्लिंगों की तीर्थयात्रा अधूरी मानी जाती है ।  
  • संतान सुख की प्राप्ति: पौराणिक कथा के कारण, यह मंदिर निःसंतान दंपतियों के लिए एक विशेष आस्था का केंद्र है। माना जाता है कि यहाँ सच्ची श्रद्धा से की गई प्रार्थना से संतान सुख की प्राप्ति होती है ।  
  • पाप और कष्टों से मुक्ति: आदि गुरु शंकराचार्य के अनुसार, घृष्णेश्वर का केवल नाम स्मरण करने से ही व्यक्ति सभी प्रकार के रोगों, दोषों और पापों से मुक्त हो जाता है ।  

अद्वितीय वास्तुकला: पत्थरों में जीवंत होती कला

घृष्णेश्वर मंदिर, लाल और काले ज्वालामुखी चट्टानों से निर्मित, वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है। इसकी शैली मुख्य रूप से हेमाडपंथी है, जिस पर मराठा वास्तुकला का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है ।  

  • शिखर और गर्भगृह: मंदिर के ऊपर एक भव्य पांच-स्तरीय शिखर है, जो दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला की याद दिलाता है । मंदिर का गर्भगृह 17×17 फुट का है, जिसमें पूर्वाभिमुख शिवलिंग स्थापित है। यह एक दुर्लभ विशेषता है, क्योंकि भारत में केवल महाकालेश्वर और घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग ही पूर्वाभिमुख हैं ।  
  • सभा मंडप: मंदिर का विशाल सभा मंडप 24 नक्काशीदार स्तंभों पर टिका हुआ है। इन स्तंभों पर भगवान शिव की विभिन्न कथाओं, पौराणिक दृश्यों और देवी-देवताओं की मूर्तियों को बड़ी ही कुशलता से उकेरा गया है ।  
  • विशिष्ट नक्काशी: मंदिर की दीवारों पर भगवान विष्णु के दस अवतारों (दशावतार) को भी खूबसूरती से दर्शाया गया है, जो शैव और वैष्णव परंपराओं के सुंदर संगम का प्रतीक है । गर्भगृह के ठीक सामने भगवान शिव के वाहन, नंदी की एक भव्य प्रतिमा स्थापित है ।  
  • लक्षविनायक गणेश पीठ: मंदिर परिसर में 21 गणेश पीठों में से एक ‘लक्षविनायक’ का भी स्थान है, जो इस स्थल के धार्मिक महत्व को और बढ़ाता है ।  
  • सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग मंदिर: आकार में यह सभी 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों में सबसे छोटा है, लेकिन इसका आध्यात्मिक प्रभाव अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है ।  

मंदिर की वास्तुकला और यहाँ के नियम इसकी पौराणिक कथा के मूल संदेश को जीवंत करते हैं। भक्तों को शिवलिंग का ‘स्पर्श दर्शन’ करने की अनुमति देना घुष्मा की व्यक्तिगत और मूर्त भक्ति (हाथों से शिवलिंग बनाना) की परंपरा को आगे बढ़ाता है। यह ईश्वर और भक्त के बीच की बाधाओं को हटाता है। इसी तरह, पुरुषों के लिए गर्भगृह में कमर से ऊपर वस्त्रहीन होने का नियम अहंकार के त्याग का प्रतीक है, जो भक्त को ईश्वर के समक्ष उसी विनम्र अवस्था में लाता है जिसमें घुष्मा थीं।  

दर्शन, आरती और दैनिक अनुष्ठान

मंदिर में दिन भर विभिन्न अनुष्ठान होते हैं, जिनमें पंचामृत पूजन, रुद्र अभिषेक और महामृत्युंजय जाप प्रमुख हैं । तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए दर्शन और आरती का समय नीचे दिया गया है।  

अनुष्ठान/दर्शनसामान्य दिनों का समयश्रावण मास का समय
मंदिर खुलने का समयप्रातः 5:30 बजेप्रातः 3:00 बजे
मंगल आरतीप्रातः 4:00 बजेप्रातः 4:00 बजे
सामान्य दर्शनप्रातः 5:30 – रात्रि 9:30प्रातः 3:00 – रात्रि 11:00
मध्याह्न आरती/भोगदोपहर 12:00 बजेदोपहर 12:00 बजे
संध्या आरतीसायं 7:30 बजेसायं 7:30 बजे
शयन आरतीरात्रि 10:00 बजेरात्रि 10:00 बजे
मंदिर बंद होने का समयरात्रि 9:30 बजेरात्रि 11:00 बजे

प्रमुख त्योहार: जब उत्सव में डूब जाता है वेरुल

  • महाशिवरात्रि: यह मंदिर का सबसे बड़ा त्योहार है। इस दिन विशेष पूजा, रात भर जागरण और रुद्राभिषेक का आयोजन होता है। भगवान शिव की पालकी को धूमधाम से पास के शिवालय तीर्थ कुंड तक ले जाया जाता है ।  
  • श्रावण मास: यह पूरा महीना शिव भक्ति को समर्पित होता है। प्रत्येक सोमवार को मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, और इस दौरान दर्शन के लिए मंदिर के कपाट अतिरिक्त समय के लिए खुले रहते हैं ।  
  • कार्तिक पूर्णिमा (त्रिपुरारी पूर्णिमा): इसे ‘देव दिवाली’ के रूप में भी मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस अवसर पर मंदिर को दीपों से सजाया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है ।  

वार्षिक तीर्थयात्री: आस्था का प्रवाह

त्योहारों के दौरान मंदिर में भक्तों की संख्या में भारी वृद्धि होती है। यह तालिका विभिन्न अवसरों पर आने वाले तीर्थयात्रियों की अनुमानित संख्या दर्शाती है, जो आपकी यात्रा की योजना बनाने में मदद कर सकती है।

महीना/अवसरअनुमानित दैनिक तीर्थयात्री
सामान्य दिन (अक्टूबर-फरवरी)5,000 – 8,000
सामान्य दिन (मार्च-सितंबर)3,000 – 5,000
श्रावण सोमवार50,000 – 75,000
महाशिवरात्रि1,00,000+
कार्तिक पूर्णिमा20,000 – 30,000

आपकी यात्रा की योजना: एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका

कैसे पहुँचें
  • हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) है, जो मंदिर से लगभग 30 किमी दूर है। यहाँ से टैक्सी या बस द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है ।  
  • रेल मार्ग: निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन औरंगाबाद (AWB) है, जो देश के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। स्टेशन से मंदिर तक की दूरी लगभग 30 किमी है ।  
  • सड़क मार्ग: घृष्णेश्वर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। औरंगाबाद से 30 किमी, पुणे से लगभग 250 किमी, नासिक से 172 किमी और मुंबई से लगभग 355 किमी की दूरी पर स्थित है ।  
कहाँ ठहरें

वेरुल और पास के खुल्दाबाद में कई बजट होटल, लॉज और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं, जैसे होटल कैलास और सिद्धेश्वर भक्त निवास । बेहतर और अधिक विकल्पों के लिए, औरंगाबाद शहर में रुकना एक अच्छा विकल्प है, जहाँ हर बजट के लिए होटल उपलब्ध हैं।  

क्या करें और क्या करें

  • पहनावा: गर्भगृह में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र (शर्ट, बनियान) उतारने पड़ते हैं। महिलाओं को साड़ी या सलवार कमीज जैसे शालीन भारतीय परिधान पहनने की सलाह दी जाती है ।  
  • प्रतिबंधित वस्तुएं: मंदिर के अंदर मोबाइल फोन, कैमरा, और चमड़े की वस्तुएं (जैसे बेल्ट, पर्स) ले जाना सख्त मना है ।  
  • यात्रा का सबसे अच्छा समय: मौसम के लिहाज से अक्टूबर से फरवरी का समय सबसे अनुकूल होता है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है ।  

घृष्णेश्वर के आसपास: दर्शनीय स्थलों की खोज

घृष्णेश्वर की यात्रा केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है; यह एक पूरे “आध्यात्मिक-ऐतिहासिक परिदृश्य” का अनुभव करने का अवसर है। जहाँ एलोरा की गुफाएँ आपको इतिहास दिखाती हैं, वहीं घृष्णेश्वर आपको उस इतिहास को जीने का अनुभव कराता है।

  • एलोरा की गुफाएं: मंदिर से मात्र 1.5 किमी दूर स्थित यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों को समर्पित 34 रॉक-कट गुफाओं का एक अद्भुत समूह है। गुफा संख्या 16 में स्थित कैलाश मंदिर एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया दुनिया का सबसे बड़ा ढांचा है ।  
  • भद्र मारुति मंदिर: खुल्दाबाद में स्थित यह मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित है। यहाँ हनुमान जी की मूर्ति दुर्लभ ‘शयन’ (लेटी हुई) मुद्रा में है, जो इसे अद्वितीय बनाती है ।  
  • दौलताबाद का किला: देवगिरि के नाम से भी जाना जाने वाला यह अजेय किला अपनी जटिल रक्षा प्रणाली, अंधेरी भूलभुलैया और शीर्ष पर स्थित ‘चांद मीनार’ के लिए प्रसिद्ध है ।  
  • खुल्दाबाद: इसे “संतों की घाटी” कहा जाता है। यहाँ कई सूफी संतों की दरगाहें और मुगल सम्राट औरंगजेब का सादा मकबरा स्थित है ।  
  • बीबी का मकबरा: औरंगाबाद शहर में स्थित, इसे “दक्कन का ताज” भी कहा जाता है। यह औरंगजेब ने अपनी पत्नी दिलरस बानो बेगम की याद में बनवाया था और यह ताजमहल की एक सुंदर प्रतिकृति है ।  

कथा का सार: भक्ति, क्षमा और विश्वास की सीख

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग और उसकी कथा हमें जीवन के कुछ गहरे सत्य सिखाती है:

  1. अटूट विश्वास की शक्ति: घुष्मा की कहानी दर्शाती है कि जब विश्वास अडिग होता है, तो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी दैवीय कृपा संभव है। उनकी भक्ति ने मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की ।  
  2. क्षमा का सर्वोच्च गुण: अपने पुत्र के हत्यारे को क्षमा करने की क्षमता मानवीय करुणा की पराकाष्ठा है। यह हमें सिखाता है कि क्षमा, प्रतिशोध से कहीं अधिक शक्तिशाली और दिव्य गुण है ।  
  3. निःस्वार्थ प्रार्थना: घुष्मा ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा, बल्कि भगवान शिव से लोक-कल्याण के लिए वहां निवास करने का अनुरोध किया। यह सच्ची भक्ति का सार है, जो व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर सर्वजन के हित की कामना करती है ।  

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग केवल एक तीर्थ स्थल नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा विद्यालय है जहाँ हर पत्थर, हर स्तंभ और हर मंत्र हमें भक्ति, करुणा और क्षमा का पाठ पढ़ाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. घृष्णेश्वर का क्या अर्थ है? घृष्णेश्वर का अर्थ है “करुणा के ईश्वर” (Lord of Compassion)। यह नाम भगवान शिव के उस करुणामय रूप का प्रतीक है जो उन्होंने अपनी भक्त घुष्मा पर दिखाया था ।  

2. क्या घृष्णेश्वर मंदिर में शिवलिंग को स्पर्श करने की अनुमति है? हाँ, घृष्णेश्वर उन कुछ ज्योतिर्लिंगों में से एक है जहाँ भक्तों को गर्भगृह में जाकर शिवलिंग का ‘स्पर्श दर्शन’ करने और स्वयं जलाभिषेक करने की अनुमति है ।  

3. मंदिर में दर्शन के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है? मौसम के लिहाज से अक्टूबर से फरवरी तक का समय सबसे सुखद होता है। यदि आप उत्सवों का अनुभव करना चाहते हैं, तो महाशिवरात्रि और श्रावण मास विशेष हैं, लेकिन इन समयों में बहुत भीड़ होती है ।  

4. घृष्णेश्वर और एलोरा की गुफाओं को घूमने के लिए कितने दिन चाहिए? आराम से घूमने के लिए दो दिन का समय आदर्श है। एक दिन एलोरा की गुफाओं और घृष्णेश्वर मंदिर के लिए और दूसरा दिन दौलताबाद किला, बीबी का मकबरा और औरंगाबाद के अन्य स्थलों के लिए रखा जा सकता है।

5. क्या मंदिर के अंदर फोटोग्राफी या मोबाइल फोन की अनुमति है? नहीं, मंदिर परिसर के अंदर मोबाइल फोन, कैमरे और किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ले जाना सख्त वर्जित है ।  

6. मंदिर में प्रवेश के लिए क्या कोई ड्रेस कोड है? हाँ, पुरुषों को गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए कमर से ऊपर के वस्त्र (शर्ट, टी-शर्ट, बनियान) उतारने पड़ते हैं। सभी आगंतुकों के लिए शालीन वस्त्र पहनना अनिवार्य है ।  

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