शिव तांडव स्तोत्र का अर्थ, तांडव स्तोत्र हिंदी मीनिंग, शिव तांडव व्याख्या, हर श्लोक का अर्थ, Shiv Tandav Stotra meaning in Hindi
Shiv Tandav Stotram meaning in Hindi, Shiv Tandav Stotram explanation, Tandav Stotram meaning, detailed meaning of Shiv Tandav
यह स्तोत्र एक प्रगतिशील ध्यान प्रक्रिया की तरह है। यह भगवान शिव के विराट ब्रह्मांडीय स्वरूप के दर्शन से शुरू होता है, फिर उनके विशिष्ट गुणों और कार्यों पर ध्यान केंद्रित करता है, और अंत में भक्त की व्यक्तिगत प्रार्थना और स्तोत्र के फल पर समाप्त होता है। आइए, प्रत्येक श्लोक के गहरे अर्थ और प्रतीकवाद को समझें।
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श्लोक१
मूल श्लोक:
जटाटवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्ग मालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥
शब्दार्थ:
जटाटवी: जटारूपी वन
गलज्जल: बहता हुआ जल (गंगा)
पावितस्थले: पवित्र किया गया स्थान (कंठ)
भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्: सर्पों की विशाल माला
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद: डम-डम की ध्वनि
चकार: किया
चण्डताण्डवं: प्रचण्ड तांडव
तनोतु: विस्तार करें
नः: हमारा
शिवः: शिव
शिवम्: कल्याण
भावार्थ:
जिनकी जटारूपी वन से प्रवाहित होती हुई गंगाजी की धाराओं से जिनका कंठ प्रदेश पवित्र हो रहा है, जिनके गले में विशाल सर्पों की माला लटक रही है, और जो डमरू से डम-डम की ध्वनि निकालते हुए प्रचण्ड तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे भगवान शिव हम सबका कल्याण करें।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक स्तोत्र का मंगलाचरण है, जो शिव के विराट और गतिशील स्वरूप का आह्वान करता है।
जटाटवी: शिव की जटाएं केवल केश नहीं हैं; वे अनंत ब्रह्मांड का प्रतीक हैं, जिसमें अनगिनत आकाशगंगाएं और लोक समाए हुए हैं।
गंगाकाप्रवाह: जटाओं से निकलती गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान और शुद्धि की अविरल धारा है। जब यह धारा उनके कंठ को पवित्र करती है, तो यह दर्शाता है कि परम ज्ञान विष को भी धारण करने की क्षमता रखता है (जैसा कि उन्होंने समुद्र मंथन में विषपान किया था)।
सर्प माला: सर्प काल (समय), मृत्यु और भय का प्रतीक है। शिव का सर्पों को आभूषण की तरह धारण करना यह दर्शाता है कि वे काल और मृत्यु के स्वामी हैं, और उनके भक्त इन भयों से मुक्त हो जाते हैं।
डमरूकीध्वनि: “डमड्डमड्डमड्डम” की ध्वनि सृष्टि का primordial sound या ‘नाद ब्रह्म’ है। यह ब्रह्मांड के सृजन, लय और स्पंदन का प्रतीक है। इसी ध्वनि से व्याकरण और संगीत की उत्पत्ति मानी जाती है।
चण्डताण्डवं: यह ‘रुद्र तांडव’ का सूचक है, जो विनाश और परिवर्तन की ऊर्जा से भरा है। लेकिन इस विनाश का उद्देश्य अशुभ का नाश कर ‘शिवम्’ अर्थात शुभ और कल्याण की स्थापना करना है।
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श्लोक२
मूल श्लोक:
जटाकटाह सम्भ्रमभ्रमन्नि लिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥
शब्दार्थ:
जटाकटाह: जटारूपी कड़ाह
निलिम्पनिर्झरी: देव नदी गंगा
विलोलवीचिवल्लरी: चंचल लहर रूपी लताएं
विराजमानमूर्धनि: सुशोभित मस्तक पर
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्: धक्-धक् कर जलती हुई
ललाटपट्टपावके: मस्तक की सतह पर अग्नि
किशोरचन्द्रशेखरे: बाल चंद्रमा को शिखर पर धारण करने वाले
रतिः: प्रेम, अनुराग
प्रतिक्षणंमम: मेरा प्रत्येक क्षण
भावार्थ:
जिनके जटारूपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई देव नदी गंगा की चंचल लहरें उनके मस्तक को सुशोभित कर रही हैं, जिनके ललाट पर अग्नि धक्-धक् कर प्रज्वलित हो रही है, और जिनके मस्तक पर बाल चंद्रमा एक आभूषण की भांति विराजमान है, उन भगवान शिव में मेरा अनुराग प्रत्येक क्षण बढ़ता रहे।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक शिव के मस्तक के तीन प्रमुख प्रतीकों – गंगा, अग्नि और चंद्रमा – पर ध्यान केंद्रित करता है।
गंगाकीचंचललहरें: यह चेतना के प्रवाह की चंचलता और गतिशीलता का प्रतीक है।
ललाटपरअग्नि: यह शिव का तीसरा नेत्र है, जो ज्ञान और अंतर्दृष्टि का प्रतीक है। यह ‘ज्ञानाग्नि’ है जो काम, क्रोध, लोभ जैसे विकारों और अज्ञान के अंधकार को भस्म कर देती है। “धगद्धगद्धगज्” ध्वनि इस अग्नि की प्रचंडता को दर्शाती है।
किशोरचन्द्र: बाल चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव द्वारा इसे मस्तक पर धारण करना मन पर पूर्ण नियंत्रण का द्योतक है। यह दर्शाता है कि योगी का मन शांत, शीतल और नियंत्रण में रहता है, भले ही उसके भीतर ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित हो। यह श्लोक हमें सिखाता है कि ज्ञान (अग्नि) और मन (चंद्रमा) का संतुलन ही शिवत्व है।
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श्लोक३
मूल श्लोक:
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
शब्दार्थ:
धराधरेन्द्रनन्दिनी: पर्वतराज (हिमालय) की पुत्री पार्वती
विलासबन्धुबन्धुर: जिनकी लीलाओं से दिशाएं प्रकाशित हैं
प्रमोदमानमानसे: जिनका मन आनंदित हो रहा है
कृपाकटाक्षधोरणी: कृपा दृष्टि की अविरल धारा
निरुद्धदुर्धरापदि: कठिन से कठिन विपत्ति का निवारण
दिगम्बरे: दिशाओं को वस्त्र रूप में धारण करने वाले
विनोदमेतु: आनंद प्राप्त करे
भावार्थ:
पर्वतराज की पुत्री पार्वती के विलासपूर्ण कटाक्षों से जिनकी समस्त दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं और जिनका मन आनंदित हो रहा है, जिनकी कृपा दृष्टि की अविरल धारा से कठिन से कठिन विपत्तियां भी दूर हो जाती हैं, उन दिगम्बर (दिशाओं को वस्त्र रूप में धारण करने वाले) तत्व में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक शिव के ‘अर्धनारीश्वर’ स्वरूप और उनकी करुणामयी प्रकृति को दर्शाता है।
पार्वतीकाविलास: यह ‘शक्ति’ और ‘प्रकृति’ का प्रतीक है। शिव ‘पुरुष’ हैं, और पार्वती ‘प्रकृति’। दोनों के मिलन से ही सृष्टि में आनंद और सौंदर्य का संचार होता है। यह श्लोक बताता है कि शिव अपनी शक्ति (पार्वती) के बिना अधूरे हैं।
कृपाकटाक्षधोरणी: यह शिव की असीम करुणा को दर्शाता है। उनकी एक कृपा दृष्टि भक्त के जीवन की सबसे बड़ी बाधाओं को भी समाप्त कर सकती है।
दिगम्बर: इसका शाब्दिक अर्थ ‘नग्न’ नहीं है। इसका दार्शनिक अर्थ है ‘जिसने दिशाओं को ही अपना वस्त्र बना लिया हो’, अर्थात जो देश और काल की सीमाओं से परे, अनंत और सर्वव्यापी है। रावण ऐसे ही निराकार, सर्वव्यापी तत्व में अपने मन को रमाने की प्रार्थना कर रहा है।
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श्लोक४
मूल श्लोक:
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥
शब्दार्थ:
जटाभुजङ्ग: जटाओं में सर्प
पिङ्गल: पीले-भूरे रंग का
स्फुरत्फणामणिप्रभा: फन की मणि का प्रकाश
कदम्बकुङ्कुम: केसर जैसा
दिग्वधूमुखे: दिशा रूपी वधुओं के मुख पर
मदान्धसिन्धुर: मदमस्त हाथी
त्वगुत्तरीय: खाल रूपी दुपट्टा
भूतभर्तरि: प्राणियों के रक्षक
भावार्थ:
मेरा मन उन प्राणियों के रक्षक भगवान शिव में अद्भुत आनंद प्राप्त करे, जिनकी जटाओं में लिपटे सर्प के फण की मणि का पीला-भूरा प्रकाश, दिशा रूपी वधुओं के केसर से लिपे मुख को सुशोभित कर रहा है, और जिन्होंने मदमस्त हाथी की खाल को दुपट्टे की भांति धारण किया हुआ है।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक शिव के विरोधाभासी स्वरूप को और गहराई देता है।
सर्प मणि का प्रकाश: सर्प की मणि का प्रकाश शिव की दिव्य चेतना का प्रतीक है जो सभी दिशाओं में फैल रही है। दिशाओं को ‘वधुओं’ के रूप में चित्रित करना एक काव्यात्मक कल्पना है, जो दर्शाती है कि शिव की उपस्थिति से संपूर्ण ब्रह्मांड सुंदर और प्रकाशित हो जाता है।
मदमस्त हाथी की खाल: हाथी, विशेषकर मदमस्त हाथी, अनियंत्रित अहंकार और पाशविक वृत्तियों का प्रतीक है । शिव द्वारा उसकी खाल को एक वस्त्र की तरह धारण करना यह दर्शाता है कि उन्होंने अहंकार और पाशविकता पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। यह भक्त को अपने अहंकार को वश में करने की प्रेरणा देता है ।
भूतभर्तरि: इन भयंकर प्रतीकों के बावजूद, शिव ‘भूतभर्तरि’ हैं – सभी प्राणियों के पालक और रक्षक। यह दर्शाता है कि उनकी संहारक शक्ति भी अंततः सृष्टि के पालन और संतुलन के लिए ही है ।
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श्लोक५
मूल श्लोक:
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥
शब्दार्थ:
सहस्रलोचन: हजार आंखों वाले, इंद्र
प्रभृति: आदि
अशेषलेखशेखर: समस्त देवता
प्रसूनधूलिधोरणी: फूलों की धूल की धारा
विधूसराङ्घ्रिपीठभूः: जिनके चरण-चौकी धूसर हो रहे हैं
भुजङ्गराजमालया: सर्पराज की माला से
निबद्धजाटजूटकः: बँधी हुई जटाएं
श्रियै: संपत्ति के लिए
चकोरबन्धुशेखरः: चंद्रमा को शिखर पर धारण करने वाले
भावार्थ:
इंद्र आदि समस्त देवताओं द्वारा उनके मस्तक के पुष्पों की धूल से जिनकी चरण-चौकी धूसर हो रही है, जिनकी जटाएं सर्पराज की माला से बंधी हैं, वे चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले भगवान शिव हमें चिरस्थायी संपत्ति प्रदान करें ।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक शिव की सर्वोच्चता को स्थापित करता है।
देवताओं का नमन: इंद्र (सहस्रलोचन) सहित सभी देवता शिव के चरणों में शीश झुकाते हैं। उनके मुकुटों से गिरे फूलों की धूल शिव के चरणों की चौकी पर जमा हो जाती है, जो यह दर्शाता है कि शिव देवों के भी देव, महादेव हैं। यह उनकी परम सत्ता का प्रतीक है।
सर्पराज और चंद्रमा: यहाँ फिर से विरोधाभास है। जहाँ उनकी जटाएं भयंकर सर्पराज (वासुकी) से बंधी हैं, वहीं उनके मस्तक पर शांति और शीतलता का प्रतीक चंद्रमा विराजमान है । यह दर्शाता है कि वे सभी द्वंद्वों से परे हैं और संतुलन के स्वामी हैं।
श्रियै चिराय जायतां: ऐसे परम शक्तिशाली और सर्वोच्च ईश्वर से भक्त ‘चिरस्थायी संपत्ति’ की प्रार्थना करता है। यह केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक समृद्धि, ज्ञान और शांति की भी याचना है ।
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श्लोक६
मूल श्लोक:
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥
शब्दार्थ:
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जय: मस्तक पर जलती हुई अग्नि
स्फुलिङ्गभा: चिंगारियों से
निपीतपञ्चसायकं: कामदेव को भस्म करने वाले
नमन्निलिम्पनायकम्: देवताओं द्वारा पूजित
सुधामयूखलेखया: अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति से
महाकपालि: महान कपाल धारण करने वाले
सम्पदे: सिद्धि के लिए
भावार्थ:
जिन शिव ने देवताओं का गर्व दहन करते हुए कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति तथा गंगा जी से सुशोभित जटा वाले, तेज-रूप नर मुंड धारी शिव जी हमें सिद्धियां प्रदान करें।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक शिव के संहारक और कल्याणकारी, दोनों रूपों का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत करता है।
काम-दहन: शिव के मस्तक पर स्थित तीसरे नेत्र की अग्नि ने कामदेव (पंचसायक) को भस्म कर दिया था । यह घटना अनियंत्रित इच्छाओं और वासना पर विजय का प्रतीक है।
देवताओं द्वारा वंदना: कामदेव को भस्म करने के बाद भी देवता उनकी वंदना करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि यह विनाश भी सृष्टि के संतुलन के लिए आवश्यक था ।
अग्नि और अमृत: जहाँ एक ओर उनके मस्तक पर विनाशक अग्नि है, वहीं दूसरी ओर अमृत किरणों वाले चंद्रमा की शीतलता भी है । यह दर्शाता है कि शिव परम वैरागी होते हुए भी परम कल्याणकारी हैं। वे विनाश और सृजन, दोनों के स्वामी हैं।
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श्लोक७
मूल श्लोक:
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥
शब्दार्थ:
करालभालपट्टिका: भयंकर मस्तक की सतह
धगद्धगद्धगज्ज्वल: धक्-धक् कर जलती हुई
आहुतीकृत: भस्म कर दिया
प्रचण्डपञ्चसायके: शक्तिशाली कामदेव को
धराधरेन्द्रनन्दिनी: पर्वतराज की पुत्री पार्वती
कुचाग्रचित्रपत्रक: स्तनों पर चित्रकारी
प्रकल्पनैकशिल्पिनि: करने में एकमात्र कलाकार
त्रिलोचने: तीन नेत्रों वाले में
भावार्थ:
मेरी प्रीति उन तीन नेत्रों वाले भगवान शिव में हो, जिन्होंने अपने धधकते हुए भयंकर मस्तक की अग्नि में शक्तिशाली कामदेव को भस्म कर दिया था, और जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तनों पर चित्रकारी करने वाले एकमात्र कलाकार हैं ।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक शिव के सबसे बड़े विरोधाभासों में से एक को उजागर करता है – वे परम संहारक भी हैं और परम प्रेमी और कलाकार भी।
पुनः काम-दहन: कामदेव को भस्म करने की घटना का पुनः उल्लेख उनकी वैराग्य और आत्म-संयम की शक्ति पर जोर देता है ।
प्रेमी और कलाकार: वही शिव जो वासना को भस्म करते हैं, प्रेम के सबसे कोमल रूप को भी प्रकट करते हैं। उनका अपनी पत्नी पार्वती के स्तनों पर कलाकारी करना, उनके प्रेम, स्नेह और सृजनात्मकता का प्रतीक है । यह दर्शाता है कि सच्चा प्रेम वासना से परे है और एक दिव्य कला है। यह शिव के ‘अर्धनारीश्वर’ स्वरूप का एक और सुंदर चित्रण है, जहाँ विनाशक और सृजनकर्ता एक ही तत्व में विलीन हो जाते हैं।
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श्लोक८
मूल श्लोक:
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥
शब्दार्थ:
नवीनमेघमण्डली: नए बादलों के समूह
कुहूनिशीथिनीतमः: अमावस्या की रात्रि का अंधकार
प्रबन्धबद्धकन्धरः: जिनका कंठ बँधा हुआ (काला) है
निलिम्पनिर्झरीधरः: गंगा को धारण करने वाले
कृत्तिसिन्धुरः: हाथी की खाल धारण करने वाले
कलानिधानबन्धुरः: कला के भण्डार चंद्रमा के मित्र
श्रियं: सम्पन्नता
जगद्धुरन्धरः: जगत का भार उठाने वाले
भावार्थ:
वे शिव हमें सभी प्रकार की सम्पन्नता प्रदान करें, जिनका कंठ नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्या की रात्रि के समान काला है, जो गंगा और बाल-चंद्रमा से शोभायमान हैं, जो हाथी की खाल धारण करते हैं और जो इस संपूर्ण जगत का भार उठाते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक शिव के उस स्वरूप का वर्णन करता है जो समस्त ब्रह्मांड का भार वहन करता है।
काला कंठ: उनका कंठ समुद्र मंथन में हलाहल विष पीने के कारण अमावस्या की रात्रि के समान काला है । यह उनकी उस क्षमता का प्रतीक है कि वे सृष्टि को बचाने के लिए सभी नकारात्मकता और विष को स्वयं में धारण कर लेते हैं।
जगतकाभार: ‘जगद्धुरन्धरः’ कह कर रावण उन्हें स्वीकार करता है कि वे ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड के आधार और पालक हैं 61।
सम्पन्नता का स्रोत: जो शिव विष को धारण कर सकते हैं, अहंकार (हाथी) को नियंत्रित कर सकते हैं, ज्ञान (गंगा) और मन (चंद्रमा) को संतुलित कर सकते हैं, और पूरे जगत का भार उठा सकते हैं, वही सच्ची और स्थायी सम्पन्नता (‘श्रियं’) प्रदान कर सकते हैं ।
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श्लोक९
मूल श्लोक:
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥
शब्दार्थ:
प्रफुल्लनीलपङ्कज: खिले हुए नीलकमल
कालिमप्रभा: की काली आभा
स्मरच्छिदं: कामदेव का नाश करने वाले
पुरच्छिदं: त्रिपुरासुर का नाश करने वाले
भवच्छिदं: सांसारिक बंधनों को काटने वाले
मखच्छिदं: दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाले
गजच्छिदान्धकच्छिदं: गजासुर और अंधकासुर का वध करने वाले
अन्तकच्छिदं: यमराज का भी अंत करने वाले
भावार्थ:
मैं उन भगवान शिव को भजता हूँ, जिनका कंठ खिले हुए नीलकमल की काली आभा के समान है, जो कामदेव, त्रिपुरासुर, सांसारिक बंधनों, दक्ष के यज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और स्वयं मृत्यु के देवता यम का भी विनाश करने वाले हैं।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक शिव के संहारक रूप की एक विस्तृत सूची प्रस्तुत करता है, लेकिन इसका गहरा अर्थ ‘रचनात्मक विनाश’ है।
विनाश की सूची: यहाँ गिनाए गए सभी विनाश नकारात्मकता, अहंकार, अज्ञान और अन्याय के प्रतीक हैं।
स्मरच्छिदं (कामदेव): अनियंत्रित वासना का नाश।
पुरच्छिदं (त्रिपुरासुर): अज्ञान और भ्रम के तीन पुरों का नाश ।
भवच्छिदं (संसार): जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति ।
मखच्छिदं (दक्षयज्ञ): धार्मिक अहंकार का नाश।
गजच्छिदं, अन्धकच्छिदं (असुर): आसुरी वृत्तियों का नाश।
अन्तकच्छिदं (यम): मृत्यु के भय का नाश ।
संहारकाउद्देश्य: शिव का संहार अंधाधुंध नहीं है। वे संतुलन स्थापित करने, बुराई को हटाने और भक्तों को सांसारिक और आध्यात्मिक बाधाओं से मुक्त करने के लिए विनाश करते हैं, ताकि एक बेहतर और उच्चतर अवस्था स्थापित हो सके 63।
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श्लोक१०
मूल श्लोक:
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥
शब्दार्थ:
अखर्वसर्वमङ्गला: कभी न क्षीण होने वाली सर्व-मंगलमयी (पार्वती)
कलाकदम्बमञ्जरी: की कलारूपी कदम्ब-मंजरी
रसप्रवाहमाधुरी: के रस-प्रवाह की माधुरी
मधुव्रतम्: का पान करने वाले भौंरे
(बाकीशब्दश्लोक९केसमान): कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्ष यज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का अंत करने वाले
भावार्थ:
मैं उन शिव को भजता हूँ, जो कभी न क्षीण होने वाली सर्व-मंगलमयी पार्वती की कलारूपी कदम्ब-मंजरी के रस का पान करने वाले भौंरे के समान हैं, और जो कामदेव से लेकर यमराज तक का अंत करने वाले हैं ।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक पिछले श्लोक की संहारक सूची को दोहराता है, लेकिन इसकी शुरुआत में एक अत्यंत सुंदर और कोमल उपमा जोड़ता है।
शिव एक भौंरे के रूप में: यहाँ शिव को एक ‘मधुव्रत’ (भौंरा) के रूप में चित्रित किया गया है जो देवी पार्वती (‘सर्वमङ्गला’) की कलाओं की मंजरी से माधुर्य-रस का पान कर रहा है। यह शिव और शक्ति के अविभाज्य और प्रेमपूर्ण संबंध को दर्शाता है। यह बताता है कि परम संहारक भी प्रेम और सौंदर्य के परम भोक्ता हैं ।
संहार और प्रेम का संतुलन: संहारकों की सूची को इस कोमल उपमा के साथ दोहराना यह स्थापित करता है कि शिव की विनाश करने की शक्ति उनके प्रेम और सृजन की शक्ति से ही संतुलित होती है। वे मृत्यु पर भी विजय इसलिए पाते हैं क्योंकि वे जीवन और कला के परम सार का आनंद लेना जानते हैं।
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श्लोक११
मूल श्लोक:
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥
शब्दार्थ:
जयत्वदभ्रविभ्रम: आकाश में वेग से घूमते हुए
भ्रमद्भुजङ्गमश्वस: घूमते हुए सर्प की फुफकार से
करालभालहव्यवाट्: भयंकर मस्तक की अग्नि और प्रचंड हो रही है
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्: धिमि-धिमि की ध्वनि करते हुए
मृदङ्गतुङ्गमङ्गल: मृदंग की मंगल ध्वनि
प्रचण्डताण्डवः: प्रचण्ड तांडव करने वाले शिव
भावार्थ:
उन भगवान शिव की जय हो, जो आकाश में वेग से घूमते हुए सर्प की फुफकार से और भी प्रचंड होती हुई मस्तक की अग्नि के साथ, मृदंग की धिमि-धिमि मंगल ध्वनि के क्रम से प्रचण्ड तांडव कर रहे हैं।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक तांडव नृत्य के दृश्य और ध्वनि का एक जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है।
गति और ऊर्जा: ‘विभ्रम-भ्रमद्’ जैसे शब्द नृत्य की तीव्र गति को दर्शाते हैं। इस गति से शिव के गले में लिपटे सर्प भी घूम रहे हैं और उनकी फुफकार से शिव के तीसरे नेत्र की ज्ञान-अग्नि और भी प्रज्वलित हो रही है
प्रलय की लय: “धिमिद्धिमिद्धिमि” यह केवल मृदंग की ध्वनि नहीं है, यह ब्रह्मांड के सृजन और विनाश के चक्र की लय है। यह ध्वनि उस प्रलय में भी एक व्यवस्था और क्रम (‘ध्वनिक्रम’) को दर्शाती है।
भयंकरता में मंगल: इस अत्यंत उग्र और भयंकर दृश्य के वर्णन के बाद भी, रावण ‘जय’ और ‘मंगल’ जैसे शब्दों का प्रयोग करता है। यह दर्शाता है कि शिव का यह प्रचंड तांडव भी अंततः जगत के कल्याण (‘शिवम’) के लिए ही है ।
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श्लोक१२
मूल श्लोक:
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥
शब्दार्थ:
दृषद्विचित्रतल्पयोः: पत्थर और सुंदर बिस्तर में
भुजङ्गमौक्तिकस्रजोः: सर्प और मोतियों की माला में
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः: बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में
सुहृद्विपक्षपक्षयोः: मित्र और शत्रु पक्ष में
तृणारविन्दचक्षुषोः: घास के तिनके और कमल में
प्रजामहीमहेन्द्रयोः: प्रजा और राजा में
समंप्रवर्तयन्मनः: समान भाव रखने वाले
कदासदाशिवंभजे: सदाशिव को मैं कब भजूँगा
भावार्थ:
कठोर पत्थर और कोमल शय्या, सर्प और मोतियों की माला, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले, मित्र और शत्रु, घास के तिनके और कमल, प्रजा और राजा के प्रति समान भाव रखने वाले सदाशिव को मैं कब भजूँगा?
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक योग और वेदांत के सर्वोच्च सिद्धांत – ‘समदृष्टि’ या समभाव – को दर्शाता है।
द्वंद्वों से परे: शिव सांसारिक द्वंद्वों (dualities) से परे हैं। उनके लिए अच्छा-बुरा, मूल्यवान-मूल्यहीन, मित्र-शत्रु का कोई भेद नहीं है । वे हर वस्तु में, हर जीव में, हर परिस्थिति में एक ही परम तत्व को देखते हैं।
योगीकाआदर्श: यह एक परम योगी की अवस्था है, जो सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि में स्थिर रहता है। शिव उसी स्थिर और शांत चेतना के प्रतीक हैं।
भक्त की आकांक्षा: रावण ‘कदा…भजे’ (मैं कब भजूँगा) कहकर स्वयं उस समदृष्टि की अवस्था को प्राप्त करने की आकांक्षा व्यक्त कर रहा है। वह केवल शिव की पूजा नहीं करना चाहता, बल्कि शिव के जैसा बनना चाहता है – द्वंद्वों से मुक्त और परम शांति में स्थित ।
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श्लोक१३
मूल श्लोक:
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन्।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
शब्दार्थ:
कदा: कब
निलिम्पनिर्झरी: देव नदी गंगा
निकुञ्जकोटरे: की गुफा में
वसन्: निवास करते हुए
विमुक्तदुर्मतिः: बुरे विचारों से मुक्त होकर
शिरःस्थमञ्जलिंवहन्: सिर पर हाथ जोड़कर
विलोललोललोचनो: भक्ति के आँसुओं से भरे नेत्रों से
शिवेतिमन्त्रमुच्चरन्: ‘शिव’ मंत्र का उच्चारण करते हुए
सुखीभवाम्यहम्: मैं सुखी होऊँगा
भावार्थ:
कब मैं गंगाजी के किनारे किसी गुफा में निवास करते हुए, बुरे विचारों से मुक्त होकर, सिर पर अंजलि बाँधे, भक्तिभाव से डबडबाई आँखों से ‘शिव’ मंत्र का उच्चारण करते हुए सुखी होऊँगा?।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक एक भक्त की अंतिम अभिलाषा को व्यक्त करता है।
आदर्श साधना: रावण यहाँ एक साधक के लिए आदर्श स्थिति का वर्णन कर रहा है – पवित्र स्थान (गंगा तट), एकांत (गुफा), मन की शुद्धि (विमुक्तदुर्मतिः), पूर्ण समर्पण (शिरः स्थमञ्जलिं), भाव की तीव्रता (विलोललोललोचनो), और निरंतर साधन (शिवेति मन्त्रमुच्चरन्)।
सुख की परिभाषा: रावण के लिए अब लंका का राज्य, धन या शक्ति सुख नहीं है। सच्चा सुख इन सब को त्याग कर, केवल शिव-भक्ति में लीन हो जाने में है। यह श्लोक भौतिक सुखों की क्षणभंगुरता और आध्यात्मिक आनंद की स्थिरता को दर्शाता है । यह अहंकार के पूर्ण विलय और भक्ति में परम आनंद की खोज है।
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श्लोक१४
मूल श्लोक:
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१४॥
शब्दार्थ:
इमंहि: इस
उत्तमोत्तमंस्तवं: उत्तमोत्तम स्तोत्र को
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो: पढ़ने, स्मरण करने और कहने वाला मनुष्य
विशुद्धिमेतिसन्ततम्: निरंतर परम शुद्धि को प्राप्त होता है
हरेगुरौ: गुरु शिव में
सुभक्तिमाशुयाति: शीघ्र ही उत्तम भक्ति को प्राप्त करता है
नान्यथागतिं: कोई दूसरा मार्ग नहीं है
विमोहनंहि: क्योंकि मोह को दूर करने वाला है
सुशङ्करस्यचिन्तनम्: भगवान शंकर का चिंतन
भावार्थ:
जो कोई भी इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण या श्रवण करता है, वह सदैव परम शुद्ध और निर्मल रहता है और गुरु शिव में अविचल भक्ति शीघ्र प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है, क्योंकि भगवान शंकर का चिंतन ही सभी मोह को दूर कर देता है ।
विस्तृत व्याख्या:
यह श्लोक स्तोत्र के पाठ का फल (फलश्रुति) बताता है।
त्रिविध साधन: ‘पठन्, स्मरन्, ब्रुवन्’ (पढ़ना, स्मरण करना, कहना) – यह ज्ञान, ध्यान और कर्म तीनों को इंगित करता है। केवल यंत्रवत पढ़ना नहीं, बल्कि अर्थ का मनन करना और दूसरों को सुनाना भी महत्वपूर्ण है ।
फल: इसका फल है – ‘विशुद्धि’ (आंतरिक और बाह्य पवित्रता), ‘सुभक्ति’ (अविचल भक्ति) और ‘विमोहनं’ (मोह या भ्रम का नाश)। यह स्तोत्र साधक को भौतिक भ्रम से निकालकर आध्यात्मिक स्पष्टता की ओर ले जाता है ।
चिंतन का महत्व: श्लोक के अंत में कहा गया है कि केवल ‘शंकरस्य चिन्तनम्’ (शिव का चिंतन) ही मोह को दूर करने वाला है। यह इस बात पर जोर देता है कि स्तोत्र का अंतिम लक्ष्य पाठक को शिव के स्वरूप के गहरे ध्यान और चिंतन में ले जाना है ।
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श्लोक१५
मूल श्लोक:
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१५॥
शब्दार्थ:
पूजावसानसमये: पूजा के अंत में
दशवक्त्रगीतं: रावण द्वारा गाया गया यह स्तोत्र
पठतिप्रदोषे: प्रदोष काल (संध्या समय) में पढ़ता है
तस्य: उसको
स्थिरां: स्थिर
रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां: रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त
लक्ष्मीं: लक्ष्मी (समृद्धि)
प्रददातिशम्भुः: भगवान शंभु प्रदान करते हैं
भावार्थ:
जो व्यक्ति शिव-पूजन के अंत में, प्रदोष काल (संध्या के समय) में, रावण द्वारा गाए गए इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवान शंभु उसे रथ, श्रेष्ठ हाथी और घोड़ों से युक्त स्थिर और अनुकूल रहने वाली लक्ष्मी (समृद्धि) प्रदान करते हैं ।
विस्तृत व्याख्या:
यह अंतिम श्लोक स्तोत्र के भौतिक लाभों को स्पष्ट करता है।
प्रदोष काल का महत्व: प्रदोष काल भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस समय किया गया पाठ विशेष फलदायी होता है ।
स्थिर लक्ष्मी: यहाँ ‘स्थिर’ शब्द महत्वपूर्ण है। यह केवल क्षणिक धन-लाभ नहीं, बल्कि स्थायी समृद्धि, ऐश्वर्य और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है। रथ, हाथी और घोड़े प्राचीन काल में राजसी वैभव और शक्ति के प्रतीक थे ।
आध्यात्मिक और भौतिक संतुलन: यह स्तोत्र दर्शाता है कि सच्ची शिव-भक्ति साधक को न केवल मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करती है, बल्कि उसके भौतिक जीवन को भी सुखी और समृद्ध बनाती है। भगवान शिव अपने भक्तों की आध्यात्मिक और सांसारिक, दोनों प्रकार की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हैं।
(जरूरी नोट: “यह लेख हमारे शिव तांडव स्तोत्रम्: का एक हिस्सा है। संपूर्ण जानकारी के लिए मुख्य पृष्ठ पर जाएँ या लिंक पर क्लिक करे।”)