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हर हर महादेव! – हम सब जीवन में गलतियाँ करते हैं। कभी छोटी, कभी बड़ी। लेकिन क्या कोई गलती इतनी बड़ी हो सकती है कि उसे माफ ही न किया जा सके? क्या होता है जब हम जानते-बूझते हुए पाप के रास्ते पर चलते रहते हैं? आज हम शिव पुराण के तीसरे अध्याय से एक ऐसी ही कहानी जानेंगे, जो हमें कर्म, भय और पश्चाताप का असली मतलब सिखाएगी।
समुद्र के किनारे वाष्कल गाँव में बिंदुग नाम का एक ब्राह्मण रहता था। नाम का ब्राह्मण था, पर काम सारे राक्षसों वाले। वह दुराचारी, व्यभिचारी और पाप कर्मों में डूबा रहता था। उसकी पत्नी चंचुला, जो बहुत सुंदर थी, वह भी पति की संगति में रहकर पूरी तरह बिगड़ गई। दोनों का जीवन पाप और अधर्म में बीत रहा था।
एक दिन, कर्म का पहिया घूमा। बिंदुग जंगल में नशे में धुत था, जहाँ एक बाघ ने उसे मार डाला और वह अपने पापों के कारण सीधा नरक लोक पहुँच गया।
आप सोच रहे होंगे कि पति की ऐसी मृत्यु देखकर चंचुला सुधर गई होगी? नहीं। वह अपने मायके आकर पहले की तरह ही पाप के रास्ते पर चलती रही। उसे न समाज का डर था, न ईश्वर का।
एक दिन, चंचुला यूं ही भटकते हुए एक शिव मंदिर में जा पहुँची। वहाँ एक ज्ञानी ब्राह्मण शिव पुराण की कथा सुना रहे थे। वह ठीक उस समय नरक में मिलने वाली यातनाओं का वर्णन कर रहे थे।
ब्राह्मण बता रहे थे, “जो स्त्रियाँ व्यभिचार करती हैं, उन्हें यमदूत जलते हुए लोहे के डंडों से दागते हैं! उन्हें असहनीय पीड़ा दी जाती है!”
जैसे ही ये शब्द चंचुला के कानों में पड़े, वह कांप उठी। एक पल में उसे अपने सारे बुरे कर्म याद आ गए। उसे वह भयानक भविष्य दिखाई दे गया, जो नरक में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसका दिल भय से भर गया।
कथा समाप्त होते ही, चंचुला रोती हुई उस ब्राह्मण के चरणों में गिर पड़ी। वह बोली, “हे स्वामी! मैं महापापिनी हूँ! मैंने आज तक धर्म को जाना ही नहीं। आपकी बातों ने मुझे जगा दिया है। मैं नरक की यातनाओं से डर गई हूँ। मुझ जैसी पापी का उद्धार कैसे होगा? मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा करें!”
चंचुला की कहानी हमें एक शक्तिशाली संदेश देती है:

“पाप का अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, पश्चाताप का एक आँसू भी प्रकाश की किरण ला सकता है।”– शिव पुराण